1. [email protected] : আল আহাদ নাদিম : A.K.M. Al Ahad Nadim
  2. [email protected] : আশিকুর রহমান খান : Ashikur Rahman Khan
  3. [email protected] : আবুবকর আল রাজি : Abubakar Al Razi
  4. [email protected] : আদনান হোসেন : Adnan Hossain
  5. [email protected] : আফসানা মিমি : Afsana Mimi
  6. [email protected] : আঁখি রহমান : Akhi Rahman
  7. [email protected] : অমিক শিকদার : Amik Shikder
  8. [email protected] : আমজাদ হোসেন সাজ্জাদ : Amjad Hossain Sajjad
  9. [email protected] : অনুপ চক্রবর্তী : Anup Chakrabartti
  10. [email protected] : আশা দেবনাথ : Asha Debnath
  11. [email protected] : আতিফ সালেহীন : Md Atif Salehin
  12. [email protected] : মোঃ আতিকুর রহমান : Md Atikur Rahman
  13. [email protected] : Md Atikur Rahman : Md Atikur Rahman
  14. [email protected] : আব্দুর রহিম : Abdur Rahim Badsha
  15. [email protected] : champa :
  16. [email protected] : এস. মাহদীর অনিক : Sulyman Mahadir Anik
  17. [email protected] : Admin : Md Nurul Amin Sikder
  18. [email protected] : নিলয় দাস : Niloy Das
  19. [email protected] : এমারত খান : Emarot Khan
  20. [email protected] : ফারিয়া তাবাসসুম : Faria Tabassum
  21. [email protected] : ফারাজানা পায়েল : Farjana Akter Payel
  22. [email protected] : ফাতেমা খানম ইভা : Fatema Khanom
  23. [email protected] : gafur :
  24. [email protected] : জব সার্কুলার স্টাফ : Job Circular Staff
  25. [email protected] : হাবিবা বিনতে হেমায়েত : Habiba Binte Namayet
  26. [email protected] : হাসান উদ্দিন রাতুল : Hasan Uddin Ratul
  27. [email protected] : মোঃ ইব্রাহিম হিমেল : Md Ebrahim Himel
  28. [email protected] : Jannat Akter ripa 11 :
  29. joypodder27[email protected] : জয় পোদ্দার : Joy Podder
  30. [email protected] : জুয়াইরিয়া ফেরদৌসী : Juairia Ferdousi
  31. [email protected] : kaiumregan :
  32. [email protected] : এল. মিম : Rahima Latif Meem
  33. [email protected] : Lamiya :
  34. [email protected] : Mamtaz Hasan : Mamtaz Hasan
  35. [email protected] : মোঃ মানিক মিয়া : Md Manik Mia
  36. [email protected] : Mashuque Muhammad : Mashuque Muhammad
  37. [email protected] : মোঃ আশিকুর রহমান : MD ASHIKUR RAHMAN
  38. [email protected] : Md. Habibur Rahman :
  39. [email protected] : রেদোয়ান গাজী : MD. Redoan Gazi
  40. [email protected] : Md.sumon :
  41. [email protected] : mdtanvirislam360 :
  42. [email protected] : মিকাদাম রহমান : Mikadum Rahman
  43. [email protected] : মাহমুদা হক মিতু : Mahmuda Haque Mitu
  44. [email protected] : momin sagar :
  45. [email protected] : মৌসুমী পাল : Mousumee paul
  46. [email protected] : মৃদুল আল হামদ : Mridul Al Hamd
  47. [email protected] : Muhammad Sadik :
  48. [email protected] : নজরুল ইসলাম : Nazrul Islam
  49. [email protected] : এন এইচ দ্বীপ : Nahid Hasan Dip
  50. [email protected] : Nurmohammad :
  51. [email protected] : Nurmohammad Islam :
  52. [email protected] : ononto :
  53. [email protected] : পায়েল মিত্র : Payel Mitra
  54. [email protected] : প্রজ্ঞা পারমিতা দাশ : Pragga Paromita Das
  55. [email protected] : প্রান্ত দাস : pranto das
  56. [email protected] : পূজা ভক্ত অমি : Puja Bhakta Omi
  57. [email protected] : ইরফান আহমেদ রাজ : Md Rabbi Khan
  58. [email protected] : রবিউল ইসলাম : Rabiul Islam
  59. [email protected] : RakibulHasanRahat :
  60. [email protected] : রুকাইয়া করিম : Rukyia Karim
  61. [email protected] : সাব্বির হোসেন : Sabbir Hossain
  62. [email protected] : Sabrin :
  63. [email protected] : সাদিয়া আফরিন : Sadia Afrin
  64. [email protected] : সাদিয়া আহম্মেদ তিশা : Sadia Ahmed Tisha
  65. [email protected] : Sajida khatun :
  66. [email protected] : সাকিব শাহরিয়ার ফারদিন : Sakib Shahriar Fardin
  67. [email protected] : সিফাত জামান মেঘলা : Sefat Zaman Meghla
  68. [email protected] : shakilabdullah :
  69. [email protected] : সিদরাতুল মুনতাহা শশী : Sidratul Muntaha
  70. [email protected] : হাসান আল-আফাসি : Hasan Alafasy
  71. [email protected] : সাদ ইবনে রহমান : Shad Ibna Rahman
  72. [email protected] : শুভ রায় : Shuvo Roy
  73. [email protected] : Shuvo dey :
  74. [email protected] : Sikder N. Amin : Md. Nurul Amin Sikder
  75. snate[email protected] : SNA Tech : SNA Tech
  76. [email protected] : সৈয়দ মেজবা উদ্দিন : Syed Mejba Uddin
  77. [email protected] : ইসরাত কবির তামিম : Israt Kabir Tamim
  78. [email protected] : তানবিন কাজী : Tanbin
  79. [email protected] : Tarikul Islam : Tarikul Islam
  80. [email protected] : Tawhidal :
  81. [email protected] : তাইয়্যেবা অর্নিলা : Tayaba Ornila
  82. [email protected] : tohomina :
  83. [email protected] : Toma : Sweety Akter
  84. [email protected] : toshinislam74 :
  85. [email protected] : এম. কে উজ্জ্বল : Ujjal Malakar
আদর্শ ব্যক্তিত্ব গঠনে সূরা-হুজরাতের নির্দেশনা!
শুক্রবার, ২৭ মে ২০২২, ০৮:৩৮ অপরাহ্ন

আদর্শ ব্যক্তিত্ব গঠনে সূরা-হুজরাতের নির্দেশনা!

ব্যক্তিত্ব গঠনে সূরা-হুজরাতের নির্দেশনা

আদর্শ ব্যক্তিত্ব গঠনে একজন মুমিনের সূরা-হুজরাতের নির্দেশনা মহান আল্লাহর দেওয়া সর্বোচ্চ নিয়ামতের অন্যতম স্বীকৃতি। মহান আল্লাহ তায়ালা মানবজাতি সৃষ্টি করেছেন সর্বোত্তম সৌন্দর্য ও আদর্শের প্রতীক হিসেবে।

মানুষের মাঝে তিনি দিয়েছেন জ্ঞান-বুদ্ধি, চিন্তা-চেতনা, ভালো-মন্দ পার্থক্যের সক্ষমতা, আবেগ-অনুভুতি এবং ভালোবাসা। বিশেষত এ রকম কিছু বৈশিষ্ট্যের কারণে মানবজাতি সৃষ্টির সেরা জীব অর্থাৎ আশরাফুল মাখলুকাত হিসেবে প্রমানিত।

তবুও সৃষ্টিগত ভাবে মানুষের মধ্যে কিছু মানবীয় দূর্বলতা আল্লাহ্ তায়া’লা দিয়ে দিয়েছেন। তবে এই দূর্বলতার কারণে মানুষ যেন শয়তানের ধোঁকায় না পরে নিজ আদর্শ ধরে রাখতে পারে, সে জন্য মহান আল্লাহ তায়া’লা যুগে যুগে অগণিত নবী ও রাসূল প্রেরণ করেছেন। তাঁদের মধ্যে আমাদের জন্য সর্বশ্রেষ্ঠ নবী মুহাম্মদ (সা.) এর মাধ্যমে দিয়েছেন মহান গ্রন্থ আল-কুরআনুল কারীম৷ আর মহান এই কিতাবে আল্লাহ্ তায়া’লা মানবজাতিকে দিয়েছেন আদর্শ ব্যক্তিত্ব গঠনের জন্য সূরা-হুজরাতে এমন কিছু বিশেষ দিক-নির্দেশনা।

মানুষের প্রকৃত আদর্শ প্রকাশিত হয় একমাত্র তার আচার-আচরণ ও বৈশিষ্ট্যের মাধ্যমে। আর প্রকৃত অর্থে মানুষের মধ্যে তারাই আবার সর্বোত্তম আদর্শ ও বৈশিষ্ট্যের অনুসারী যারা মুমিন।

তাই আল্লাহ্ তায়া’লা মানুষের আদর্শ ব্যক্তিত্ব গঠনে সূরা-হুজরাতের নির্দেশনা গুলো বর্ণনা করেছেন, যেন সকল জ্বীন ও মানবজাতি এই নির্দেশনাগুলো গ্রহন ও মান্য করে প্রকৃত মুমিন হতে সক্ষম হয়৷ তবে আসুন একনজরে সূরা-হুজরাতের এমন কিছু নির্দেশনা সম্পর্কে জেনে নেই৷

আদর্শ ব্যক্তিত্ব গঠনে সূরা-হুজরাতের নির্দেশনাঃ

  • “কাউকে উপহাস না করা।” [আয়াত-১১]
  • “অন্যের দোষারোপ না করা।”[আয়াত-১১]
  • “করো নাম বিকৃত না করা এবং মন্দ নামে না ডাকা।”[আয়াত-১১]
  • “পশ্চাতে কারো নিন্দা না করা।” [আয়াত-১২]
  • “অধিক ধারনা বা অনুমান না করা অর্থাৎ মন্দ ধারণা থেকে বিরত থাকা।” [আয়াত-১২]
  • “গীবত ও ছিদ্রান্বেষন না করা।”[আয়াত-১২]
  • “ফাসিকের সংবাদ যাচাই ব্যতিরেকে বিশ্বাস না করা।”[আয়াত-৬]
  • “বিবাদমান দুটি পক্ষের ঝামেলা ন্যায়পন্থায় মীমাংসা করে দেওয়া।” [আয়াত-৯]
  • “সর্বাবস্থায় ইনসাফ প্রতিষ্ঠা করা।”[আয়াত-৯]
  • “সকল মর্যাদার মূল মাপকাঠি ‘তাকওয়া’।” [আয়াত ১৩]

মুমিনের আদর্শ ব্যক্তিত্ব গঠনে সূরা-হুজরাতের এসকল নির্দেশনাগুলোর মধ্যে মাত্র কয়েকটি নির্দেশনা আজ আমরা সংক্ষেপে জেনে নেওয়ার চেষ্টা করব, ইং শা আল্লাহ।

উপহাস, দোষারোপ ও নাম বিকৃত না করাঃ

পবিত্র কুরআনে কারীমে মহান আল্লাহ্ তায়া’লা মুমিন বান্দাদের নির্দেশ করে বলেছেন-

“হে ঈমানদারগণ ! কোন মুমিন সম্প্রদায় যেন অপর কোন মুমিন সম্প্রদায়কে উপহাস না করে; কেননা যাদেরকে উপহাস করা হচ্ছে তারা উপহাসকারীদের চেয়ে উত্তম হতে পারে এবং নারীরা যেন অন্য নারীদেরকে উপহাস না করে; কেননা যাদেরকে উপহাস করা হচ্ছে তারা উপহাসকারিণীদের চেয়ে উত্তম হতে পারে। আর তোমরা একে অন্যের প্ৰতি দোষারোপ করো না এবং তোমরা একে অন্যকে মন্দ নামে ডেকো না ; ঈমানের পর মন্দ নাম অতি নিকৃষ্ট। আর যারা তওবা করে না তারাই তো যালিম।” [সূরা হুজরাতঃ১১]

হযরত মুহাম্মদ (সা.) যখন মদিনায় আগমন করেন, তখন সেখানকার অধিকাংশ লোকের দুই তিনটি করে নাম ছিল। তন্মধ্যে কোনো কোনো নাম সংশ্লিষ্ট ব্যক্তিকে লজ্জা দেয়া ও লাঞ্ছিত করার জন্য লোকেরা খ্যাত করেছিল। রাসূলুল্লাহ (সা.) তা জানতেন না। তাই মাঝে মাঝে সেই মন্দ নাম ধরে তিনিও সম্বোধন করতেন। তখন সাহাবায়ে কেরাম বলতেনঃ ইয়া রাসূলাল্লাহ, সে এই নাম শুনলে অসন্তুষ্ট হয়। এই ঘটনার পরিপ্রেক্ষিতে আলোচ্য আয়াতটি অবতীর্ণ হয়। [আবু দাউদ:৪৯৬২, মুসনাদে আহমাদ: ৫/৩৮০]

“আর উপহাস বা বিদ্রূপ করার অর্থ কেবল কথার দ্বারা হাসি-তামাসা করাই নয় ৷ বরং কারো কোন কাজের অভিনয় করা, তার প্রতি ইংগিত করা, তার কথা, কাজ, চেহারা বা পোশাক নিয়ে হাসাহাসি করা অথবা তার কোন ত্রুটি বা দোষের দিকে এমনভাবে দৃষ্টি আকর্ষন করা যাতে অন্যদের হাসি পায় ৷ এ সবই হাসি -তামাসার অন্তুর্ভুক্ত ৷ মূল নিষিদ্ধ বিষয় হলো কেউ যেন কোনভাবেই কাউকে উপহাস ও হাসি -তামাসার লক্ষ্য না বানায়৷ কারণ, এ ধরনে হাসি-তামাসা ও ঠাট্রা-বিদ্রূপের পেছনে নিশ্চিতভাবে নিজের বড়ত্ব প্রদর্শন এবং অপরের অপমানিত করা ও হেয় করে দেখানোর মনোবৃত্তি কার্যকর ৷ যা নৈতিকভাবে অত্যন্ত দোষনীয় ৷ তাছাড়া এভাবে অন্যের মনোকষ্ট হয়, যার কারণে সমাজে বিপর্যয় ও বিশৃংখলা দেখা দেয় ৷ এ কারণেই এ কাজকে হারাম করে দেয়া হয়েছে।” [তাফহীমুল কুরআন]

মহান আল্লাহ তায়া’লা একজন ব্যক্তির ইমান আনার পরে, তার মাঝে বিদ্যমান সকল ভুল কাজগুলোর মধ্যে মন্দ নাম রাখা অথবা কাউকে মন্দ নামে বিকৃত বা বিদ্রুপ করাকে সবচেয়ে নিকৃষ্ট কাজের অন্তর্ভুক্ত করেছেন।

তাই একজন আদর্শ মুমিন ব্যক্তি কখনোই অন্যকে উপহাস বা বিদ্রুপ করা কিন্বা কোন মুমিন ব্যক্তি কাউকে মন্দ নামে ডাকতে পারে না৷ কেননা এ থেকে বিরত থাকা তার আদর্শ ব্যক্তিত্ব ও নৈতিকতার পরিচয়।

কু-ধারণা, দোষ খোঁজা ও গীবত না করাঃ

পবিত্র কুরআনে কারীমে মহান আল্লাহ তায়া’লা একজন মুমিনের জন্য আদর্শ ব্যক্তিত্ব গঠনে সূরা-হুজরাতের নির্দেশনা গুলোর মধ্যে উল্লেখ করেন-

“হে ঈমানদারগণ ! তোমরা অধিকাংশ অনুমান বা ধারণা হতে দূরে থাক ; কারণ কোন কোন অনুমান পাপ এবং তোমরা একে অন্যের গোপনীয় বিষয় সন্ধান করো না এবং একে অন্যের গীবত করো না। তোমাদের মধ্যে কি কেউ তার মৃত ভাইয়ের গোশত খেতে চাইবে? বস্তুত তোমরা তো একে ঘৃণ্যই মনে কর। আর তোমরা আল্লাহর তাকওয়া অবলম্বন কর; নিশ্চয় আল্লাহ্ তওবা গ্রহণকারী, পরম দয়ালু।”[ সূরা-হুজরাতঃ ১২]

এই আয়াতে পারস্পরিক হক ও সামাজিক রীতি-নীতি ব্যক্ত হয়েছে এবং এতে তিনটি বিষয় হারাম ঘোষণা করা হয়েছে। এক: ধারণা, দুই: গোপন দোষ সন্ধান করা এবং তিন: গীবত অর্থাৎ, কোনো ব্যক্তি সম্পর্কে এমন কথা বলা যা সে শুনলে অসহনীয় মনে করত।

(১) প্রবল ধারণা বা অনুমান না করাঃ

আয়াতের প্রথম বিষয় হচ্ছে অন্যের সম্পর্কে প্ৰবল কু-ধারণা বা অতিরিক্ত অনুমান না করা। রাসূলুল্লাহ (সা.) এর হাদিস থেকে আমরা জানতে পারি, তিনি বলেছেন-

তোমাদের কারও আল্লাহর প্রতি সু-ধারণা পোষণ ব্যতীত মৃত্যুবরণ করা উচিত নয়।” [মুসলিম: ৫১২৫, আবুদাউদ: ২৭০৬, ইবনে মাজাহ: ৪১৫৭]

অন্য এক হাদীসে আছে-

“আমি আমার বান্দার সাথে তেমনি ব্যবহার করি, যেমন সে আমার সম্বন্ধে ধারণা রাখে। এখন সে আমার প্রতি যা ইচ্ছা ধারণা রাখুক।”[মুসনাদে আহমাদ: ১৫৪৪২]

এই হাদিস থেকে জানা যায় যে, আল্লাহর প্রতি ভাল ধারণা পোষণ করা ফরয এবং কু-ধারণা পোষন করা হারাম। এমনিভাবে যেসব মুসলিম বাহ্যিক অবস্থার দিক দিয়ে সৎকর্মপরায়ণ দৃষ্টিগোচর হয়, তাদের সম্পর্কে প্রমাণ ব্যতিরেকে কু-ধারণা পোষণ করা হারাম। [ তাফসিরে জাকারিয়া ]

তাই রাসুলুল্লাহ (সা.) বলেছেন-

“তোমরা ধারণা থেকে বেঁচে থাক। কেননা, ধারণা মিথ্যা কথার নামান্তর।” [বুখারী: ৪০৬৬, মুসলিম: ২৫৬৩]

আদর্শ ব্যক্তিত্ব গঠনে সূরা-হুজরাতের নির্দেশনা গুলোর মাঝে কারো সম্পর্কে অতিরিক্ত ধারণা করা বা অনুমান করা থেকে বিরত থাকার নির্দেশনা রয়েছে। তবে এটি আরও একটু ব্যাখ্যা করার বিষয়। বিস্তারিত ব্যাখ্যা দেখুন তাফসিরে তাফহীমুল কুরআন থেকে-

আয়াতে একেবারেই ধারণা করতে নিষেধ করা হয়নি ৷ বরং খুব বেশী ধারণার ভিত্তিতে কাজ করতে এবং সব রকম ধারণার অনুসরণ থেকে মানা করা হয়েছে৷ এর কারণ বলা হয়েছে এই যে, অনেক ধারণা গোনাহের পর্যায়ের পরে ৷ এ নির্দেশটি বুঝার জন্য আমাদের বিশ্লেষণ করে দেখা উচিত ধারণা কত প্রকার এবং প্রত্যেক প্রকারের নৈতিক অবস্থা কি?

যেমন, এক প্রকারের ধারণা হচ্ছে, যা নৈতিকতার দৃষ্টিতে অত্যন্ত পছন্দনীয় এবং দ্বীনের দৃষ্টিতেও কাম্য ও প্রশংসিত ৷ যেমনঃ আল্লাহ, তাঁর রাসূল এবং ঈমানদারদের ব্যাপারে ভাল ধারণা পোষণ করা ৷ তাছাড়া যাদের সাথে ব্যক্তির মেলামেশা ও উঠাবসা আছে এবং যাদের সম্পর্কে খারাপ ধারণা পোষনের কোন যুক্তিসংগত কারণ নেই ৷

আরেক প্রকারের ধারণা আছে যা মূলত খারাপ হলেও বৈধ প্রকৃতির ৷ এ প্রকারের ধারণা গোনাহের অন্তর্ভুক্ত হতে পারে না ৷ যেমনঃ কোন ব্যক্তি বা গোষ্ঠির চরিত্র ও কাজ-কর্মে কিংবা তার দৈনন্দিন আচার -আচরণ ও চালচলে এমন সুস্পষ্ট লক্ষণ ফুটে উঠে যার ভিত্তিতে সে আর ভাল ধারণার যোগ্য থাকে না ৷ বরং তার প্রতি খারাপ ধারণা পোষণের একাধিক যুক্তিসংগত কারণ বিদ্যমান ৷

এরূপ পরিস্থিতিতে শরীয়ত কখনো এ দাবী করে যে, সরলতা দেখিয়ে মানুষ তার প্রতি অবশ্যই ভাল ধারণা পোষণ করবে ৷ তবে বৈধ খারাপ ধারণা পোষনের চূড়ান্ত সীমা হচ্ছে তার সম্ভাব্য দুস্কৃতি থেকে রক্ষা পাওয়ার জন্য সতর্কতা অবলম্বন করতে হবে ৷ নিছক ধারণার ভিত্তিতে আরো অগ্রসর হয়ে, তার বিরুদ্ধে কোন তৎপরতা চালানো ঠিক নয় ৷

তৃতীয় আরেক প্রকারের ধারণা আছে, যা মূলত গোনাহ, সেটি হচ্ছে, বিনা কারণে অপরের প্রতি খারাপ ধারণা পোষণ করা; কিংবা অন্যদের ব্যাপারে মতস্থির করার বেলায় সবসময় খারাপ ধারণার ওপর ভিত্তি করেই শুরু করা; কিংবা এমন লোকেদের ব্যাপারে খারাপ ধারণা পোষণ করা যাদের বাহ্যিক অবস্থা তাদের সৎ ও শিষ্ট হওয়ার প্রমাণ দেয় ৷ অনুরূপভাবে কোন ব্যক্তি কোন কথা বা কাজে যদি ভাল ও মন্দের সমান সম্ভবনা থাকে, কিন্তু খারাপ ধারণার বশবর্তী হয়ে আমরা যদি তা খারাপ হিসেবেই ধরে নেই, তাহলে তা গোনাহের কাজ বলে গণ্য হবে ৷

যেমনঃ কোন সৎ ও ভদ্র লোক কোন মাহফিল থেকে উঠে যাওয়ার সময় নিজের জুতার পরিবর্তে অন্য কারো জুতা উঠিয়ে নেন, আর আমরা যদি ধরে নেই যে, জুতা চুরি করার উদ্দেশ্যেই তিনি এ কাজ করেছেন৷ অথচ এ কাজটি ভুল করেও হতে পারে৷ কিন্তু ভাল সম্ভাবনার দিকটি বাদ দিয়ে খারাপ সম্ভাবনার দিকটি গ্রহণ করার কারণ খারাপ ধারণা ছাড়া আর কিছুই নয়৷

এ বিশ্লেষণ থেকে একথা পরিস্কার হয়ে যায় যে, ধারণা করা যেমন নিষিদ্ধ বিষয় নয় ৷ বরং কোন কোন পরিস্থিতিতে তা পছন্দনীয়, কোন কোন পরিস্থিতিতে অপরিহার্য, কোন কোন পরিস্থিতিতে একটি নির্দিষ্ট সীমা পর্যন্ত জায়েয, কিন্তু ঐ সীমার বাইরে নাজায়েয এবং কোন কোন পরিস্থিতিতে একেবারেই নাজায়েয ৷

তাই একথা বলা হয়নি যে, ধারণা বা অনুমান করা থেকে একদম বিরত থাকো ৷ বরং বলা হয়েছে, অধিকমাত্রায় ধারণা করা থেকে বিরত থাকো ৷ তাছাড়া নির্দেশটির উদ্দেশ্য সুস্পষ্ট করার জন্য আরো বলা হয়েছে , কোন কোন ধারণা গোনাহ ৷ এ সতর্কীকরণ দ্বারা আপনা থেকেই বুঝা যায় যে, যখনই কোন ব্যক্তি ধারণার ভিত্তিতে কোন সিদ্ধান্ত নিতে যাচ্ছে কিংবা কোন পদক্ষেপ সম্পর্কে সিদ্ধান্ত নিচ্ছে, তখন তার ভালভাবে যাচাই বাছাই করে দেখা দরকার।

কেননা যে ধারণা সে পোষণ করেছে তা গোনাহের অন্তর্ভুক্ত নয় তো? আসলেই কি এরূপ ধারণা পোষনের দরকার আছে? এরূপ ধারণা পোষনের জন্য তার কাছে যুক্তিসংগত কারণ আছে কি? সে ধারণার ভিত্তিতে সে যে কর্মপদ্ধতি গ্রহণ করেছে তা কি বৈধ? তাই যেসব ব্যক্তি আল্লাহকে ভয় করে এতটুকু সাবধানতা তারা অবশ্যই অবলম্বন করবে ৷ লাগামহীন ধারণা পোষণ কেবল তাদেরই কাজ যারা আল্লাহর ভয় থেকে মুক্ত এবং আখেরাতের জবাবদিহি সম্পর্কে উদাসীন। [দেখুন তাফহীমুল কুরআন সূরা-হুজরাতের ২৪ নং টীকা]

(২) অন্যের গোপন দোষ সন্ধান না করাঃ

আয়াতের দ্বিতীয় নিষিদ্ধ বিষয়টি হচ্ছে, কারও দোষ সন্ধান করা। কেননা এর দ্বারা নানা রকম ফিতনা-ফাসাদ সৃষ্টি হয়। এ কারণে নবী কারীম (সা.) তাঁর এক খোতবায় দোষ অন্বেষণকারীদের সম্পর্কে বলেছেন-

“হে সেই সব লোকজন, যারা মুখে ঈমান এনেছো। কিন্তু এখনো ঈমান তোমাদের অন্তরে প্ৰবেশ করেনি, তোমরা মুসলিমদের গোপনীয় বিষয় খুঁজে বেড়িও না। যে ব্যক্তি মুসলিমদের দোষ-ত্রুটি তালাশ করে বেড়াবে আল্লাহ্‌ তার দোষ-ত্রুটির অন্বেষণে লেগে যাবেন। আর আল্লাহ্ যার ক্ৰটি তালাশ করেন, তাকে তার ঘরের মধ্যে লাঞ্ছিত করে ছাড়েন।” [আবু দাউদ: ৪৮৮০]

হযরত মু’আবিয়া (রা.) বলেন- আমি নিজে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামকে বলতে শুনেছি-

“তুমি যদি মানুষের গোপনীয় বিষয় জানার জন্য পেছনে লাগো। তাদের জন্য বিপর্যয় সৃষ্টি করবে কিংবা অন্তত বিপর্যয়ের দ্বার প্রান্তে পৌছে দেবে।”[আবু দাউদ: ৪৮৮৮]

অন্য এক হাদীসে রাসূলুল্লাহ (সা.) বলেন-

“মুসলিমদের গীবত করো না এবং তাদের দোষ অনুসন্ধান করো না। কেননা, যে ব্যক্তি মুসলিমদের দোষ অনুসন্ধান করে, আল্লাহ তার দোষ অনুসন্ধান করেন। আল্লাহ যার দোষ অনুসন্ধান করেন, তাকে স্ব-গৃহেও লাঞ্ছিত করে দেন।”[আবুদাউদ: ৪৮৮০]

তবে দোষ-ত্রুটি অনুসন্ধান না করার এ নির্দেশ শুধু সাধারণ ব্যক্তিদের জন্যই নয়, বরং ইসলামী সরকারের জন্যেও। এ ক্ষেত্রে উমর রাদিয়াল্লাহু আনহুর এ ঘটনা অতীব শিক্ষাপ্ৰদ–

“একবার রাতের বেলা তিনি এক ব্যক্তির কণ্ঠ শুনতে পেলেন। সে গান গাইতেছিল। তাঁর সন্দেহ হলো। তিনি তার সাথী আব্দুর রহমান ইবন আওফ (রা.) বললেন- এ ঘরটি কার? বলা হল, এটা রবী’আ ইবন উমাইয়া ইবন খালফ এর ঘর। তারা এখন শরাব খাচ্ছে। আপনার কি অভিমত? অতঃপর আব্দুর রাহমান ইবন আওফ বললেন- আমার অভিমত হচ্ছে যে, আমরা আল্লাহ্ যা নিষেধ করেছে তা-ই করে ফেলছি। আল্লাহ্ তা’আলা আমাদেরকে তা করতে নিষেধ করে বলেছেন: “তোমরা গোপন বিষয়ে অন্বেষণ করো না”। তখন উমর (রা.) ফিরে আসলেন এবং তাকে ছেড়ে গেলেন।” [মুস্তাদরাকে হাকিম: ৮২৪৯, মুসান্নাফে আদির রাজ্জাকঃ ১০/২২১]

এ থেকে প্রমাণিত হয় যে, খুঁজে খুঁজে মানুষের গোপন দোষ-ত্রুটি বের করা এবং তারপর তাদেরকে পাকড়াও করা শুধু ব্যক্তির জন্যই নয়, ইসলামী সরকারের জন্যও জায়েয নয়। একটি হাদীসেও একথা উল্লেখিত হয়েছে। উক্ত এই হাদীসে নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন-

“শাসকরা যখন সন্দেহের বশে মানুষের দোষ অনুসন্ধান করতে শুরু করে, তখন তাদের চরিত্র নষ্ট করে দেয়।” [আবু দাউদ: ৪৮৮৯]

তাই একজন মুমিন কখনোই অন্যের দোষত্রুটি সন্ধান করে বেড়াবে না। বরং তার উচিত নিজের ভুলগুলো সন্ধান করা এবং তা থেকে মুক্তির জন্য আল্লাহর কাছে সহায্য কামনা করা। আর বেশি বেশি করে আল্লাহর কাছে তওবা পাঠ করা।

(৩) গীবত না করাঃ

উক্ত আয়াতে আদর্শ ব্যক্তি গঠনে সূরা-হুজরাতের নির্দেশনা এবং নিষিদ্ধ তৃতীয় বিষয়টি হচ্ছে গীবত না করা। এখন গীবত কি? এ সম্পর্কে আমাদের জানা খুবই গুরুত্বপূর্ণ। গীবতের সংজ্ঞায় রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন-

“কোন ব্যক্তি সম্পর্কে কারো এমন কথা বলা যা, শুনলে সে অপছন্দ করবে। প্রশ্ন হলো, আমি যা বলছি তা যদি আমার ভাইয়ের মধ্যে সত্যিই থেকে থাকে তাহলে আপনার মত কি? তিনি বললেন- তুমি যা বলছো তা যদি তার মধ্যে থাকে তাহলেই তো তুমি তার গীবত করলে। আর তা যদি না থাকে তাহলে অপবাদ আরোপ করলে।”[মুসলিম: ২৫৮৯, আবুদাউদ: ৪৮৭৪, তিরমিযীঃ ১৯৩৪]

সূরা-হুজরাতের এই আয়াতে তিনটি বিষয় নিষিদ্ধ করতে গিয়ে গীবিতের নিষিদ্ধতাকে অধিক গুরুত্ব দেওয়া হয়েছে এবং একে মৃত মুসলিমের মাংস ভক্ষণের সমতুল্য প্রকাশ করে এর নিষিদ্ধতা ও নীচতা ফুটিয়ে তোলা হয়েছে। মি’রাজের রাত্রির এক হাদীসে রাসূলুল্লাহ (সা.) গীবতের ভয়াবহতার বর্ণনা করতে গিয়ে বলেন-

“তারপর আমাকে নিয়ে যাওয়া হল, আমি এমন এক সম্প্রদায়ের কাছ দিয়ে গেলাম যাদের নখ ছিল তামার। তারা তাদের মুখমণ্ডল ও দেহের মাংস আচড়াচ্ছিল। আমি জিবরাঈল (আ.) কে জিজ্ঞেস করলাম, এরা কারা? তিনি বললেন- এরা তাদের ভাইয়ের গীবত করত এবং তাদের ইজ্জতহানি করত।” [মুসনাদে আহমাদ: ৩/২২৪, আবুদাউদ: ৪৮৭৮]

সুতরাং গীবত অত্যন্ত জঘন্য ও ঘৃণিত একটি কাজ। স্বয়ং মহান আল্লাহ্ তায়া’লা এ সম্পর্কে পবিত্র কুরআনে আমাদের সতর্ক করেছেন, যেন আমরা গীবত করা থেকে বেঁচে থাকি। আর রাসূল (সা.) এর হাদিসেও এর ভয়ংকর পরিনতি সম্পর্কে আমাদের সাবধান করা হয়েছে৷ তাই আদর্শ ব্যক্তিত্ব গঠনে সূরা-হুজরাতের নির্দেশনা গুলোর মধ্যে এই তিনটি বিষয় প্রত্যেক মুমিনের জন্য আল্লাহর দেওয়া খুবই গুরুত্বপূর্ণ নির্দেশ।

উচ্চস্বরে আওয়াজ অথবা কথা না বলাঃ

আল- কুরআনে সূরা-হুজরাতের নির্দেশনা গুলোর মধ্যে অন্যতম একটি নির্দেশনা হলো উচ্চস্বরে আওয়াজ অথবা কথা না বলা৷ এমনকি একাকি মহান আল্লাহ্ তায়া’লার ইবাদত করার সময়ও নীরবে ইবাদত করা তিনি বেশি পছন্দ করেন।

আল-কুরআনে আল্লাহ্ তায়া’লা বলেন-

“হে ঈমানদারগণ! তোমরা তোমাদের কণ্ঠস্বর নবীর কণ্ঠস্বরের ওপর উঁচু করো না এবং নিজেরা যেভাবে উচ্চস্বরে কথা বলো তার সাথে সেভাবে উচ্চস্বরে কথা বলো না। কারণ, তাতে তোমাদের কর্ম নিষ্ফল হয়ে যাবে এবং তোমরা তা টেরও পাবে না।”[সূরা-হুজুরাত আয়াত:০২ ]

এ আয়াতটি হযরত আবু বকর (রা.) ও হযরত উমর (রা.)-এর ব্যাপারে অবতীর্ণ হয়। হযরত আবু মুলাইকা (রা.) হতে বর্ণিত, তিনি বলেনঃ “এমন অবস্থার সৃষ্টি হয়েছিল যে, দুই মহান ব্যক্তি অর্থাৎ হযরত আবূ বকর (রা.) ও হযরত উমর (রা.) যেন প্রায় ধ্বংসই হয়ে যাবেন, যেহেতু তাঁরা নবী (স.)-এর সামনে তাঁদের কণ্ঠস্বর উঁচু করেছিলেন, যখন বানী তামীম গোত্রের প্রতিনিধি হাযির হয়েছিলেন।

তাঁদের একজন হযরত হাবিস ইবনে আকরার (রা.) প্রতি ইঙ্গিত করেন এবং অপরজন ইঙ্গিত করেন অন্য একজনের প্রতি। তখন হযরত আবূ বকর (রা.) হযরত উমর (রা.)-কে বলেনঃ “আপনি তো সব সময় আমার বিরোধিতাই করে থাকেন?” উত্তরে হযরত উমর (রা.) হযরত আবু বকর (রা.)-কে বলেনঃ “আপনার এটা ভুল ধারণা।”

এই ভাবে উভয়ের মধ্যে কথা কাটাকাটি হয় এবং তাদের কণ্ঠস্বর উঁচু হয়। তখন এই আয়াতটি অবতীর্ণ হয়। হযরত ইবনে যুবায়ের (রা.) বলেনঃ “এরপর হযরত উমর (রা.) রাসূলুল্লাহ (সা.)-এর সাথে এতো নিম্নস্বরে কথা বলতেন যে, রাসূলুল্লাহ (সা.)-কে দ্বিতীয়বার তাকে জিজ্ঞেস করতে হতো।”এ হাদীসটি ইমাম বুখারী (রহ.) বর্ণনা করেছেন।[তাফসিরে  ইবনে কাসীর ]

“হযরত আবু বকর (রা.) রাসূল (সা.) এর কাছে আরজ করলেন, হে আল্লাহর রাসূল (সা.) আল্লাহর শপথ। এখন থেকে মৃত্যু পর্যন্ত আপনার সাথে কানাকানির মতো কথা বলব। হযরত উমর (রা.) এরপর থেকে এত আস্তে কথা বলতেন যে, প্রায়ই পুনরায় জিজ্ঞেস করতে হতো। হযরত সাবেত কায়েস (রা.) এর কণ্ঠস্বর স্বভাবগতভাবেই উঁচু ছিল। এই আয়াত শুনে তিনি ভয়ে সংযত হলেন এবং কণ্ঠস্বর নিচু করে ফেললেন [তাফসিরে ইবনে কাসীর]

হযরত আবু সাঈদ (রা.) থেকে বর্ণিত-

“রাসূল (সা.) মসজিদে ইতেকাফ অবস্থায় ছিলেন, তখন সাহাবিদের উচ্চস্বরে কুরআন পাঠ শুনতে পেয়ে তিনি নীরবতা ভঙ্গ করে বললেন, নিশ্চয়ই তোমরা প্রত্যেকেই আল্লাহ তায়া’লার পরিবেশের অনুগত। সুতরাং একে অপরকে কষ্ট দেবে না এবং কুরআন পাঠ অথবা নামাজ পড়ার সময় একে অপর থেকে স্বরকে উঁচু করবে না।”[আবু দাউদ, কিতাবুস সালাত]

মহান আল্লাহ তায়া’লা তাঁর ইবাদত বা প্রার্থনাও চুপি চুপি করার জন্য পবিত্র কুরআনে নির্দেশ দিয়েছেন। যেমন, মহান আল্লাহ তায়া’লা বলেন-

“তোমরা স্বীয় প্রতিপালককে ডাকো কাকুতি মিনতি করে এবং সংগোপনে। তিনি সীমা লঙ্ঘনকারীদের পছন্দ করেন না।”[সূরা-আ’রাফ, আয়াত: ৫৫]

সুতরাং আমরা আল-কুরআন এবং সাহাবিদের এই ঘটনা আলোকে স্পষ্টত বুঝতে পারছি। অযথা উচ্চস্বরে কথা বলা কোন আদর্শ মুমিনদের কাজ নয়। মূলত রাসূল (সা.) এর সাহাবিদের এই ঘটনার মাধ্যমে আল্লাহ্ তায়া’লা উম্মতের সকল মানুষকে সতর্ক করে দিয়েছেন, যেন ভবিষ্যতে আমরা এমন ভুল না করি অর্থাৎ আমরা উচ্চস্বরে কথা বলে যেন অন্যকে বিরক্ত না করি। আর প্রিয় রাসূল (সা.) এর ক্ষেত্রে আল্লাহ্ তায়া’লার এ নির্দেশনা অবশ্যই অধিক কঠোর ৷ ঠিক তেমনি কঠোর নির্দেশনা যে, উচ্চস্বরে কথা বলে অন্যকে কষ্ট দেওয়াও আল্লাহ্ তায়া’লা পছন্দ করেন না।

মুমিন পরস্পরকে ভাই ভাই মনে করাঃ

আদর্শ ব্যক্তিত্ব গঠনে সূরা-হুজরাতের নির্দেশনা গুলোর মধ্যে মহান আল্লাহ তায়া’লা সকল মুসলিম উম্মাহকে একে অপরের ভাই-ভাই হিসেবে স্বকৃীতি দিয়েছেন। তাই ভাই হিসেবে প্রত্যেক মুমিনের সাথে সুসম্পর্ক ও সকল প্রকার আপোষ মীমাংসা করার নির্দেশ দিয়েছেন, যেন মুমিনরা একে অপর থেকে বিছিন্ন হয়ে না পরে। যেমনটি পবিত্র কোরআনে আল্লাহ তায়া’লা বলেছেন-

“মুমিনগণ তো পরস্পর ভাই ভাই ; কাজেই তোমরা তোমাদের ভাইদের মধ্যে আপোষ মীমাংসা করে দাও। আর আল্লাহর তাকওয়া অবলম্বন কর, যাতে তোমরা অনুগ্রহপ্রাপ্ত হও।” [সূরা-হুজরাতঃ ১০]

এই আয়াতটিতে দুনিয়ার সমস্ত মুসলিমকে এক বিশ্বজনীন ভ্রাতৃত্বের বন্ধনে আবদ্ধ করেছে। আর দুনিয়ার অন্য কোন আদর্শ বা মত ও পথের অনুসারীদের মধ্যে এমন কোন ভ্রাতৃত্ব বন্ধন পাওয়া যায় না, যা মুসলিমদের মধ্যে পাওয়া যায়। যা এ আয়াতের বরকতে সাধিত হয়েছে। এ নির্দেশের দাবী ও গুরুত্বসমূহ কি? বহুসংখ্যক হাদীসে রাসূলুল্লাহ (সা.) তা বর্ণনা করেছেন। তাই ঐ সব হাদীসের আলোকে এ আয়াতের আসল লক্ষ্য ও উদ্দেশ্য বোধগম্য হতে পারে। এখন আসুন এরকম কিছু হাদীসের দিকে লক্ষ্য করি-

হযরত জারীর ইবন আবদুল্লাহ (রা.) বলেন-

“রাসূলুল্লাহ (সা.) আমার থেকে তিনটি বিষয়ে “বাই’আত” নিয়েছেন। এক: সালাত কায়েম করবো। দুই: যাকাত আদায় করতে থাকবো। তিন: প্রত্যেক মুসলমানের কল্যাণ কামনা করবো।” [বুখারী: ৫৫]

অন্য হাদীসে রাসূলুল্লাহ (সা.) বলেন-

“কোনো ‘মুসলিমকে গালি দেয়া ফাসেকী এবং তার সাথে লড়াই করা কুফরী।” [বুখারী: ৬০৪৪, মুসলিম: ৬৩]

অপর হাদীসে রাসূলুল্লাহ (সা.) বলেছেন-

“প্রত্যেক মুসলমানের জন্য অপর মুসলমানের জান, মাল ও ইজ্জত হারাম।” [মুসলিম: ২৫৬৪, কিতাবুল বিরর ওয়াসসিলাহ, তিরমিয়ী: ১৯২৭]

নবী মুহাম্মদ (সা.) আরো বলেছেন-

“এক মুসলিম আরেক মুসলমানের ভাই। সে তার ওপরে জুলুম করে না, তাকে সহযোগিতা করা পরিত্যাগ করে না এবং তাকে লাঞ্ছিত ও হেয় করে না। কোন ব্যক্তির জন্য তার কোন মুসলিম ভাইকে হেয় ও ক্ষুদ্র জ্ঞান করার মত অপকৰ্ম আর নাই।” [মুসনাদে আহমাদ: ১৬/২৯৭, ৭৭৫৬]

রাসূল (সা.) আরো বলেন-

“ঈমানদারদের সাথে একজন ঈমানদারের সম্পর্ক ঠিক তেমন যেমন দেহের সাথে মাথার সম্পর্ক। সে ঈমানদারদের প্রতিটি দুঃখ-কষ্ট ঠিক অনুভব করে যেমন মাথা দেহের প্রতিটি অংশের ব্যথা অনুভব করে।” [মুসনাদে আহমাদ: ৫/৩৪০]

অপর একটি হাদীসে নবী করীম (সা.) বলেছেন

“পারস্পরিক ভালোবাসা, সুসম্পর্ক এবং একে অপরের দয়া-মায়া ও স্নেহের ব্যাপারে মুমিনগণ একটি দেহের মত। দেহের যে অংগেই কষ্ট হোক না কেন তাতে গোটা দেহ জ্বর ও অনিদ্রায় ভুগতে থাকে।” [বুখারীঃ ৬০১১, মুসলিম: ২৫৮৬]

অন্য আরো একটি হাদীসে নবী (সা.) বলেন-

“মুমিনগণ পরস্পরের জন্য একই প্রাচীরের ইটের মত একে অপরের থেকে শক্তিলাভ করে থাকে৷” [বুখারী: ২৬৪৬, মুসলিম: ২৫৮৫]

অন্য হাদীসে এসেছে-

“একজন মুসলিম অপর মুসলিমের ভাই, সে তার উপর অত্যাচার করতে পারে না। আবার তাকে ধ্বংসের মুখেও ঠেলে দিতে পারে না।” [বুখারী: ২৪৪২, মুসলিম:২৫৮০]

অন্য একটি হাদীসে বলা হয়েছে –

“আল্লাহ বান্দার সহযোগিতায় থাকেন যতক্ষণ বান্দা তার ভাইয়ের সহযোগিতায় থাকে।”[মুসলিম:২৬৯৯]

হাদীসে আরো এসেছে-

কোন মুসলিম যখন তার ভাইয়ের জন্য তার অনুপস্থিতিতে দোআ করে তখন ফেরেশতা বলে, আমিন (কবুল কর)। আর তোমার জন্যও তদ্রুপ হোক।”[মুসলিম: ২৭৩২]

এসকল হাদীস থেকে আমরা স্পষ্ট অবহিত হয়েছি, মহান আল্লাহ্ তায়া’লা আমাদের প্রত্যেক মুমিন মুসলিমকে একে অপরের ভাই হিসেবে স্বকৃীতি দিয়েছেন। তাই এক ভাই কখনো অন্য ভাইয়ের ক্ষতি করতে পারে না। কেননা আমরা সবাই একটি দেহের মত। তাই বিশ্বের অন্য কোন প্রান্তে থাকা মুসলিম ভাইয়ের উপর অত্যাচার বা নির্যাতন হলে তা আমাদের দেহে এসেও আঘাত হানে। আমরা কষ্ট অনুভব করি। তার জন্য আল্লাহর কাছে সাহায্য চাই, দোয়া করি।

আর মুৃমিন-মুমিনে কখনো অমীমাংসিত কোন আপোষ বা বিরোধ থাকতে পারে না৷ বরং এরকম কোনো আশংকা হলেও তা মীমাংসা করা প্রত্যেক মুৃমিনের কর্তব্য ও দায়িত্ব। সুতারং আল্লাহর নির্দেশ প্রত্যেক মুমিন মুসলিম একে অপরের ভাই ভাই৷ এই বন্ধনে প্রমানিত প্রত্যেক মুসলিমের আদর্শ ব্যক্তিত্ব অর্জনে সূরা- হুজরাতের নির্দেশনা গুলো অনুসরণ করা আল্লাহর বিশেষ নিয়ামতেরই স্বীকৃতি।

সারকথা ও মন্তব্যঃ

সূরা-হুজরাত মানবজাতির জন্য মহান আল্লাহ্ তায়া’লার আদর্শ নির্দেশনা সম্বলিত একটি ব্যাপক নিয়ামত সম্বলিত সূরা। তাই যদিও আমরা সংক্ষেপে সূরা-হুজরাতের নির্দেশনাগুলো বর্ণনা কিন্বা ব্যাখ্যা করতে চাই। তা নিছক একটি সামান্য চেষ্টা ছাড়া আর কিছুই নয়। মহান আল্লাহ তায়া’লার পবিত্র কালামের ব্যাখ্যা এতো সংক্ষিপ্ত আকারে প্রকাশ করার মত সাহিত্য কোন জ্বীন বা মানবজাতির কারো কাছেই নেই। বরং এসকল আয়াতের নির্দেশনা ও নিয়ামতের প্রশংসা অনন্তকাল ব্যাখ্যা করেও শেষ বলা যাবে না।

যেমনটি মহান আল্লাহ তায়া’লা বলেছেন-

“বলুন, ‘আমার রব-এর কথা লিপিবদ্ধ করার জন্য সাগর যদি কালি হয়, তবে আমার রব-এর কথা শেষ হওয়ার আগেই সাগর নিঃশেষ হয়ে যাবে—আমরা এর সাহায্যের জন্য এর মত আরো সাগর আনলেও।”[সূরা কাহফঃ১০৯]

তবে শুধুমাত্র পবিত্র কুরআনে আমাদের ব্যক্তিত্ব গঠনে সূরা-হুজরাতের নির্দেশনা গুলোই নয়। বরং সমগ্র কুরআনে মাজীদের পরতে পরতে মহান আল্লাহ্ তায়া’লা মুমিনের আদর্শ বৈশিষ্ট্যের নির্দেশনা দিয়ে অসংখ্য আয়াত নাজিল করেছেন। আমরা শুধু মাত্র সুূরা-হুজরাতের এমন কিছু আয়াত নিয়ে সামান্য আলোচনা করার চেষ্টা করেছি।

আর আমাদের এই সমান্য আলোচনার একটাই উদ্দেশ্য, আমরা যেন সবাই আদর্শ ব্যক্তিত্ব গঠনে সূরা-হুজরাতের নির্দেশনা সমূহের যথাযত ভাবে মান্য করে আল্লাহর নৈকট্য অর্জনের চেষ্টা করতে পারি। যেন দ্বীনের প্রকৃত আলোয় আলোকিত হয়ে, জান্নাতে পৌঁছাতে আল্লাহর অনুগত বান্দা হিসেবে নিজেকে প্রমান করতে পারি। তাই ইমানের বলীয়ানে এখন থেকেই আমরা প্রত্যেকে আল্লাহ নির্দেশনাগুলো যথাযথভাবে পালনের চেষ্টা করে আদর্শ ব্যক্তিত্ব গঠনে প্রতিজ্ঞাবদ্ধ, ইং শা আল্লাহ।

মহান আল্লাহর তায়া’লা আমাদের সকলকে যেন প্রকৃত আদর্শ ব্যক্তিত্ব গঠনের তৌফিক দান করেন, আমিন।

তথ্য সহায়তাঃ

  • তাফসিরে জাকারিয়া
  • তাফসিরে তাফহীমুল কুরআন।

About: হাসান আল-আফাসি

হাসান আল-আফাসিঃ "সরকারি বিজ্ঞান কলেজ, ঢাকা" থেকে ২০২০ সালে এইসএসসি পাস করেছেন। বর্তমানে সে "বাংলাদেশ ইসলামী ইউনিভার্সিটি, ঢাকা" পড়াশোনা করছেন। পড়াশোনার পাশাপাশি সে ইসলামিক ও জীবনঘনিষ্ঠ বিভিন্ন বিষয় নিয়ে অধ্যয়ন ও লেখালেখি করতে পছন্দ করেন৷

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2 responses to “আদর্শ ব্যক্তিত্ব গঠনে সূরা-হুজরাতের নির্দেশনা!”

  1. তরিকুল ইসলাম says:

    এরকম আর্টিকেল আরো চাই

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